अगर मैं अपने आप से मिलूँ…
कभी-कभी हम भीड़ में इतने खो जाते हैं कि खुद से मिलना ही भूल जाते हैं। हर दिन हम लोगों से मिलते हैं, बातें करती हैं, उनकी खुशियों और तकलीफों में शामिल होती हैं… लेकिन एक इंसान है जिससे हम सबसे कम मिलती हैं—वो है “हम खुद”।
अगर सच में एक दिन ऐसा हो कि मैं अपने आप से मिलूँ, तो शायद वो मुलाकात सबसे अलग होगी। वहाँ कोई दिखावा नहीं होगा, कोई बनावट नहीं होगी… बस एक सच्चाई होगी, जो शायद थोड़ी कड़वी भी लगे, लेकिन सुकून भी दे।
मैं अपने सामने बैठूँगी और खुद से पूछूँगी—
“कैसी है तू?”
और इस बार मैं “ठीक हूँ” कहकर बात खत्म नहीं करूँगी। क्योंकि अंदर कहीं ना कहीं ये एहसास होगा कि मैं ठीक तो हूँ, लेकिन पूरी नहीं हूँ। कुछ अधूरापन है, कुछ खामोश दर्द है, जो शब्दों में नहीं, सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
शायद मैं अपने उस रूप को देखूँगी, जो कभी बहुत खुश रहता था। छोटी-छोटी बातों में मुस्कुरा देती थी, बिना किसी डर के अपने सपनों के पीछे भागती थी। और फिर मैं आज की खुद को देखूँगी—थोड़ी समझदार, थोड़ी संभली हुई, लेकिन कहीं ना कहीं थकी हुई।
मैं खुद से पूछूँगी—
“कब तूने अपनी खुशियों को दूसरों की उम्मीदों के पीछे रख दिया?”
“कब तूने अपनी बात कहना छोड़ दिया?”
“कब तूने ये मान लिया कि तेरा दर्द किसी को समझ नहीं आएगा?”
और शायद इन सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं होगा। बस एक खामोशी होगी, जो बहुत कुछ कह जाएगी।
फिर मैं अपने पास जाऊँगी, अपने ही कंधे पर हाथ रखूँगी और कहूँगी—
“तू इतनी भी कमजोर नहीं है कि टूट जाए,
और इतनी भी मजबूत नहीं कि हर दर्द अकेले सह ले।”
ये दुनिया हमें सिखाती है कि हमेशा मजबूत बनो, कभी मत रोओ, कभी हार मत मानो। लेकिन सच तो ये है कि इंसान होना ही अपने आप में अधूरा होना है। कभी रोना, कभी टूटना, कभी थक जाना—ये सब भी जरूरी है। क्योंकि इन्हीं एहसासों के बीच हम खुद को पहचानती हैं।
अगर मैं अपने आप से मिलूँ, तो मैं उसे ये भी याद दिलाऊँगी कि उसने कितनी बार खुद को संभाला है, कितनी बार गिरकर फिर से खड़ी हुई है। वो हर छोटी-बड़ी जीत, जिसे शायद दुनिया ने नोटिस नहीं किया, लेकिन वो मेरे अंदर हमेशा जिंदा है।
मैं उससे कहूँगी—
“तूने बहुत कुछ सहा है, लेकिन तू अब भी यहाँ है…
और यही तेरी सबसे बड़ी ताकत है।”
शायद उस मुलाकात में मैं अपने सारे अधूरे सपनों को भी देखूँगी। कुछ सपने जो वक्त के साथ छूट गए, कुछ जो हालात ने रोक दिए, और कुछ जिन्हें मैंने खुद ही छोड़ दिया। लेकिन इस बार मैं उनसे भागूँगी नहीं, बल्कि उन्हें फिर से अपनाने की कोशिश करूँगी।
मैं खुद से एक वादा करूँगी—
“अब मैं तुझे नजरअंदाज नहीं करूँगी।
अब तेरी खुशी भी उतनी ही जरूरी होगी, जितनी दूसरों की है।
अब मैं तेरे साथ खड़ी रहूँगी, चाहे हालात जैसे भी हों।”
और शायद उस दिन, पहली बार मुझे ये एहसास होगा कि खुद से मिलना कितना जरूरी है। क्योंकि जब हम खुद को समझ लेती हैं, खुद को स्वीकार कर लेती हैं, तब दुनिया का कोई भी डर, कोई भी मुश्किल हमें पूरी तरह तोड़ नहीं सकती।
अंत में, अगर मैं अपने आप से मिलूँ…
तो मैं उसे बस गले लगाकर इतना ही कहूँगी—
“मैं तेरी हूँ… और अब कहीं नहीं जाऊँगी।” 🌿

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